राहुल सांकृत्यायन की जीवनी | हिंदी यात्रा साहित्य के जनक ] rahul santatyan biography in hindi

 

परिचय

राहुल सांकृत्यायन, जिन्हें महापंडित के नाम से भी जाना जाता है, हिंदी साहित्य की एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने घुमक्कड़ी को जीवन का मूलमंत्र बनाया और दुनिया को अपनी कलम से नापा। वे हिंदी यात्रा साहित्य के पितामह माने जाते हैं, जिन्होंने 36 भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया और तिब्बत से दुर्लभ ग्रंथों को भारत लाकर साहित्यिक जगत को समृद्ध किया। अगर आप हिंदी साहित्य में रुचि रखते हैं या यात्रा की कहानियों से प्रेरित होना चाहते हैं, तो राहुल सांकृत्यायन की जीवनी आपको एक नई दृष्टि देगी—एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जो कभी रुका नहीं और ज्ञान की तलाश में दुनिया की सीमाओं को पार करता रहा।

उनका जन्म नाम केदारनाथ पांडेय था, लेकिन बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने के बाद उन्होंने राहुल सांकृत्यायन नाम अपनाया। वे न केवल लेखक थे, बल्कि एक साम्यवादी चिंतक, इतिहासकार और अन्वेषक भी थे। उनकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं, खासकर जब हम वैश्विक संस्कृतियों और इतिहास की बात करते हैं। इस लेख में हम उनकी पूरी जीवन यात्रा को करीब से देखेंगे, जो संघर्ष, खोज और सृजन की मिसाल है


राहुल सांकृत्यायन की जीवनी | हिंदी यात्रा साहित्य के जनक ] rahul santatyan biography in hindi


विवरण जानकारी
पूरा नाम राहुल सांकृत्यायन (जन्म नाम: केदारनाथ पांडेय)
जन्म 9 अप्रैल 1893, पंदहा, आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 14 अप्रैल 1963
पेशा लेखक, विद्वान, यात्री, बहुभाषाविद, इतिहासकार
राष्ट्रीयता भारतीय

प्रारंभिक जीवन और परिवार

राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में हुआ था। उनका पैतृक गांव कनैला था, लेकिन वे ननिहाल में पले-बढ़े। उनके पिता गोवर्धन पांडेय एक साधारण किसान थे, जबकि माता कुलवंती देवी घरेलू महिला थीं। परिवार में चार भाई और एक बहन थे, और राहुल सबसे बड़े थे। दुर्भाग्य से, उनकी बहन का बचपन में ही निधन हो गया।

बचपन से ही राहुल की जिंदगी चुनौतियों से भरी थी। उनकी मां की असमय मौत के बाद वे नाना रामशरण पाठक के पास रहने लगे, जो सेना में सिपाही थे और दक्षिण भारत की यात्राओं से प्रभावित थे। उस समय बाल विवाह का चलन था, और राहुल का विवाह मात्र 11 वर्ष की उम्र में हो गया। लेकिन यह शादी उनके लिए बोझ बन गई, और उन्होंने घर छोड़कर ज्ञान की तलाश में निकल पड़े। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी, लेकिन राहुल की जिज्ञासा उन्हें कभी चैन से बैठने नहीं देती थी।

शिक्षा और शुरुआती संघर्ष

राहुल सांकृत्यायन की औपचारिक शिक्षा बहुत सीमित थी—वे सिर्फ मिडिल स्कूल तक पढ़े। लेकिन उनकी असली शिक्षा जीवन की यात्राओं से हुई। बचपन में वे गांव के मदरसे में गए, जहां उन्होंने उर्दू और अरबी सीखी। 15 वर्ष की उम्र में वे काशी पहुंचे और संस्कृत तथा दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। वे अयोध्या में वेदांत, आगरा में अरबी और लाहौर में फारसी सीखने गए।

शुरुआती संघर्षों में घर छोड़ना, साधु बनना और वैराग्य की तलाश शामिल थी। 1907 में वे कलकत्ता भाग गए, फिर हिमालय की यात्राएं कीं। आर्थिक तंगी और सामाजिक दबाव के बावजूद, उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बौद्ध धर्म और पाली का गहन अध्ययन श्रीलंका और तिब्बत यात्राओं से हुआ, जहां वे दुर्लभ ग्रंथों की खोज में जुटे। इन संघर्षों ने उन्हें बहुभाषाविद बनाया—वे हिंदी, संस्कृत, पाली, तिब्बती, रूसी समेत 36 भाषाओं के ज्ञाता बने।

career की शुरुआत

राहुल सांकृत्यायन का करियर घुमक्कड़ी से शुरू हुआ। वे जीवन भर यात्रा करते रहे—भारत से लेकर रूस, श्रीलंका, तिब्बत, जापान और यूरोप तक। 1917 में रूस गए, जहां रूसी क्रांति देखी। 1927 में श्रीलंका में अध्यापन किया और बौद्ध दीक्षा ली। तिब्बत की चार यात्राओं में उन्होंने हजारों ग्रंथ खच्चरों पर लादकर भारत लाए।

साहित्यिक करियर 1927 से शुरू हुआ। वे महात्मा गांधी से जुड़े, किसान आंदोलन में सक्रिय रहे और जेल गए। 'हुंकार' पत्रिका संपादित की। ब्रेकथ्रू मोमेंट तिब्बत यात्राएं रहीं, जहां से वे दुर्लभ ज्ञान लेकर लौटे और पटना संग्रहालय में संरक्षित कराए। उनकी रचनाएं जैसे 'वोल्गा से गंगा' और 'मेरी तिब्बत यात्रा' ने हिंदी साहित्य को नई ऊंचाई दी।

प्रमुख उपलब्धियाँ

राहुल सांकृत्यायन की उपलब्धियां अनगिनत हैं। यहां कुछ प्रमुख हैं:

  • यात्रा साहित्य का जनक: हिंदी में यात्रा वृत्तांत को साहित्यिक रूप दिया, जैसे 'मेरी जीवन यात्रा' और 'रूस में 25 मास'। इनमें सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विवरण हैं।

  • बहुभाषी विद्वता: 36 भाषाओं का ज्ञान, प्राचीन ग्रंथों का उद्धार।

  • बौद्ध शोध: तिब्बत से ग्रंथ लाकर हिंदी साहित्य में क्रांति लाई।

  • सामाजिक योगदान: किसान आंदोलन में भूमिका, मार्क्सवाद को भारतीय संदर्भ में अपनाया।

  • साहित्यिक रचनाएं: 140 से अधिक पुस्तकें, जैसे 'दर्शन-दिग्दर्शन' और 'बाईसवीं सदी'।

साहित्यिक कृतियाँ

राहुल सांकृत्यायन ने लगभग 140 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जो उपन्यास, यात्रा वृत्तांत, दर्शन, इतिहास, आत्मकथा और निबंध जैसी विभिन्न विधाओं में फैली हैं। उनकी रचनाएँ न केवल साहित्यिक हैं, बल्कि सामाजिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी भरपूर हैं। नीचे कुछ प्रमुख कृतियों की श्रेणीवार सूची दी गई है:

यात्रा वृतांत और घुमक्कड़ी साहित्य

  • मेरी जीवन यात्रा (आत्मकथा के कई खंड, उनका सबसे विस्तृत और लोकप्रिय कार्य)

  • घुमक्कड़ शास्त्र

  • अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा

  • मेरी तिब्बत यात्रा

  • तिब्बत में सवा वर्ष

  • ल्हासा की ओर

  • मेरी यूरोप यात्रा

  • रूस में 25 मास

उपन्यास और कहानी संग्रह

  • वोल्गा से गंगा (ऐतिहासिक कहानियों का संग्रह, उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना)

  • बाईसवीं सदी

  • भागो नहीं, दुनिया को बदलो

  • सिंह सेनापति

  • जय यौधेय

  • जीने के लिए

  • मधुर स्वप्न

  • राजस्थान निवास

  • दिवोदास

  • विस्मृत यात्री

दर्शन और निबंध

  • दर्शन दिग्दर्शन

  • दिमागी गुलामी

  • वैज्ञानिक भौतिकवाद

  • बौद्ध दर्शन

अन्य प्रमुख रचनाएँ

  • मध्य एशिया का इतिहास

  • बुद्धचर्या

  • दर्शन-दिग्दर्शन

  • स्त्री घुमक्कड़ (महिलाओं के लिए घुमक्कड़ी पर)

इन रचनाओं में उनकी घुमक्कड़ी, वैचारिक स्वतंत्रता और इतिहास बोध झलकता है। वोल्गा से गंगा और मेरी जीवन यात्रा आज भी सर्वाधिक पढ़ी जाती हैं

विवाद

राहुल सांकृत्यायन के जीवन में कुछ विवाद भी रहे, लेकिन वे हमेशा तथ्य-आधारित थे। 1947 में कम्युनिस्ट पार्टी से निकाले गए, क्योंकि उन्होंने पार्टी की भाषाई नीतियों का विरोध किया—वे हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते थे, जबकि पार्टी उर्दू की पक्षधर थी। उन्होंने मार्क्सवाद की आलोचना की, खासकर सोवियत संघ की सत्तालोलुपता पर। उन्होंने बौद्ध धर्म में पुनर्जन्मवाद को अस्वीकार किया, जिससे कुछ आलोचना हुई। वेदांत अध्ययन के बाद मंदिरों में बलि पर व्याख्यान से सनातनी पुरोहितों से विवाद हुआ। हालांकि, ये विवाद उनकी वैचारिक स्वतंत्रता को दर्शाते हैं।

व्यक्तिगत जीवन

राहुल सांकृत्यायन की तीन शादियां हुईं। पहली बचपन में संतोषी देवी से, लेकिन वे कभी साथ नहीं रहे। दूसरी रूस में एलेना नार्वर्तोवना कोजरोवस्काया से, जिनसे बेटा इगोर हुआ। तीसरी डॉ. कमला सांकृत्यायन से, जिनसे एक बेटी जया और दो बेटे हुए। अंतिम वर्षों में स्मृति लोप और मधुमेह से जूझे। वे घुमक्कड़ी स्वभाव के थे, जो कभी टिकते नहीं।

नेट वर्थ और आय स्रोत

राहुल सांकृत्यायन एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे, जिनकी नेट वर्थ का अनुमान लगाना मुश्किल है। उस दौर में लेखकों की आय सीमित होती थी। अनुमानित रूप से, उनकी संपत्ति नगण्य रही होगी, क्योंकि वे घुमक्कड़ जीवन जीते थे। आय के स्रोत मुख्य रूप से लेखन, अध्यापन (जैसे लेनिनग्राद विश्वविद्यालय), और किसान आंदोलन से जुड़े कार्य थे। ध्यान दें, यह अनुमान है और कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं।

पुरस्कार और सम्मान

राहुल सांकृत्यायन को कई सम्मान मिले:

  • 1958: साहित्य अकादमी पुरस्कार ('मध्य एशिया का इतिहास' के लिए)।

  • 1963: पद्म भूषण।

  • 1993: जन्म शताब्दी पर डाक टिकट जारी।

  • पटना में राहुल सांकृत्यायन साहित्य संस्थान।

रोचक तथ्य

  • वे घुमक्कड़ी को धर्म मानते थे: "सैर कर दुनिया की गाफिल..." से प्रेरित।

  • तिब्बत से हजारों ग्रंथ लाए।

  • जेल में 'दर्शन-दिग्दर्शन' लिखा।

  • हिंदी को राष्ट्रभाषा के प्रबल समर्थक।

  • महापंडित उपाधि काशी के पंडितों से मिली।

FAQs

राहुल सांकृत्यायन कौन थे?

वे हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, यात्री और बहुभाषाविद थे, जिन्हें महापंडित कहा जाता है।

राहुल सांकृत्यायन की उम्र कितनी थी?

वे 70 वर्ष जीए (1893-1963)।

राहुल सांकृत्यायन की नेट वर्थ कितनी थी?

अनुमानित रूप से नगण्य, क्योंकि वे घुमक्कड़ जीवन जीते थे। कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं।

राहुल सांकृत्यायन की प्रमुख रचनाएं क्या हैं?

'वोल्गा से गंगा,' 'मेरी तिब्बत यात्रा,' 'दर्शन-दिग्दर्शन,' etc.

राहुल सांकृत्यायन ने कितनी भाषाएं सीखीं?

लगभग 36 भाषाएं, जैसे हिंदी, संस्कृत, तिब्बती, और रूसी।

राहुल सांकृत्यायन का योगदान क्या था?

वे हिंदी यात्रा साहित्य के जनक थे और बौद्ध ग्रंथों को भारत लाए।

निष्कर्ष

राहुल सांकृत्यायन एक ऐसे विद्वान थे जिन्होंने ज्ञान की सीमाओं को तोड़ा और हिंदी साहित्य को वैश्विक पटल पर स्थापित किया। उनकी घुमक्कड़ी, वैचारिक स्वतंत्रता और सृजनशीलता आज भी प्रेरणा देती है। भविष्य में, जब हम सांस्कृतिक एकता और इतिहास की बात करेंगे, उनकी रचनाएं हमेशा प्रासंगिक रहेंगी। वे साबित करते हैं कि सच्चा ज्ञान किताबों से नहीं, अनुभव से आता है।

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