सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप बढ़ाते हैं वैश्विक आयात-शुल्क 15% तक
फ़रवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप द्वारा लगाए गए अधिकांश आयात कर (टैरिफ) को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद को ही कर लगाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, न कि राष्ट्रपति को। कोर्ट ने यह भी पाया कि ट्रंप जो आपातकालीन कानून (IEEPA) उपयोग कर रहे थे, उसमें आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं दिया गया था। इसके बाद ट्रंप ने अगले ही दिन कार्यकारी आदेश जारी करते हुए ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत पांच महीने के लिए 10% का वैश्विक आयात शुल्क लागू किया। एक दिन बाद उन्होंने घोषणा की कि इसी सीमा को अधिकतम 15% तक बढ़ा दिया जाएगा, जो कानून द्वारा अनुमति प्राप्त अधिकतम दर है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
न्यायालय के फैसले में कहा गया कि अमेरिकी संविधान के तहत टैक्स लगाने का अधिकार पूरी तरह से कांग्रेस (विधायिका) को सौंपी गई है। आयात शुल्क राजस्व बढ़ाने का एक तरीका है, और अमेरिकी इतिहास में इसे हमेशा कानूनी रूप से संसद की अनुमति से ही लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इंगित किया कि IEEPA कानून में ‘नियमित (regulate)’ शब्द का उपयोग आयात शुल्क लगाने के रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि पिछले 50 वर्षों में किसी भी राष्ट्रपति ने IEEPA के तहत टैरिफ नहीं लगाए, और यदि इसे कर लगाने का अधिकार माना गया तो यह कार्यकारी शक्तियों का “क्रांतिकारी विस्तार” होगा (Major Questions Doctrine)। तीन न्यायाधीशों ने निष्कर्ष निकाला कि संसद ने ऐसी व्यापक शक्तियाँ स्पष्ट रूप से नहीं सौंपी थीं।
धारा 122 के तहत नया टैरिफ
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 122 का सहारा लिया, जो बड़े व्यापार घाटे की स्थितियों में सभी देशों पर 15% तक का अस्थायी टैरिफ लगाने की इजाज़त देती है। इस प्रावधान में राष्ट्रपति को बस यह घोषित करना होता है कि देश का व्यापार घाटा बड़ा है, और वे आयात पर उपरी सीमा (15%) तक कर लगा सकते हैं; इसके लिए कोई औपचारिक जांच प्रक्रिया नहीं होती। ट्रम्प ने इसे लागू करते हुए 24 फरवरी 2026 से 150 दिनों के लिए सभी देशों पर 10% का समग्र आयात शुल्क लगाया। बाद में उन्होंने कहा कि प्रशासन इस 150-दिन अवधि का उपयोग अन्य “कानूनी रूप से संभव” उपाय तैयार करने में करेगा, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा (धारा 232) और अनुचित व्यापार आचरण (धारा 301) से संबंधित नियमों का इस्तेमाल कर विशेष उत्पादों या देशों पर नए टैरिफ लगाने की योजना।
टैरिफ की अस्थायी प्रकृति
धारा 122 के तहत लगाए गए टैरिफ स्वचालित रूप से 150 दिनों में समाप्त हो जाएंगे यदि कांग्रेस उन्हें बढ़ाने के लिए विशेष कानून नहीं बनाती। इसलिए यह व्यवस्था मूलतः अस्थायी है। ट्रम्प प्रशासन को उम्मीद थी कि इस अवधि के दौरान नया विधेयक पास हो जाएगा, पर व्यापार विशेषज्ञों को संदेह है कि चुनावों के पूर्व सार्वजनिक असहमति के बीच कांग्रेस ऐसा कदम उठाने में इच्छुक नहीं दिखती। ट्रम्प के ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यदि प्रशासन सेक्शन 301 और 232 के तहत नए टैरिफ भी लगाता है तो 2026 में कुल राजस्व लगभग वैसा ही रहेगा जैसे पुरानी दरों पर होता।
आगामी रणनीतियाँ: धारा 301 एवं अन्य
ट्रंप ने कहा है कि 150 दिनों के दौरान वह अन्य ‘क़ानूनी’ रास्तों की खोज में रहेंगे। शुक्रवार को जारी कार्यकारी आदेश में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय को निर्देश दिया गया कि वह अन्य देशों की “अन्यायपूर्ण और भेदभावपूर्ण” व्यापार नीतियों की जांच करे और ज़रूरी होने पर उन पर नए आयात-कर लगाए। यानी प्रशासन व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत चीन, ब्राजील, वियतनाम, कनाडा जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर नए शुल्क लगाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। धारा 232 के तहत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पहले से लगे लोहा-अल्यूमीनियम आदि टैरिफ प्रभावित नहीं हुए हैं, और उन पर बाद में भी कार्रवाई जारी रहेगी।
वैश्विक प्रतिक्रियाएँ
भारत की प्रतिक्रिया
भारत के लिए यह विकास चिंताजनक है। पिछले वर्ष अमेरिका ने भारत की निर्यात वस्तुओं पर कुल 25% टैरिफ लगाया, जिसे बाद में रूस से तेल आयात के लिए अतिरिक्त 25% बढ़ाकर 50% कर दिया गया। फरवरी 2026 में दोनों देशों ने समझौते में कटौती कर कुल 18% तक सहमति जताई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह दर करीब पूर्व स्तर (लगभग 3.5%) पर लौटनी थी। लेकिन अब ट्रंप के 15% वैश्विक टैरिफ के बाद भारत की प्रभावी दर 18.5% हो जाएगी, जो पिछले 18% के समझौते के करीब ही है। भारत सरकार ने कहा है कि वह इन नई स्थितियों का अध्ययन कर रही है। भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय समझौते के तहत यदि अमेरिकी टैरिफ बढ़ता है तो दोनों देश आपसी प्रतिबद्धताएँ समायोजित कर सकते हैं, जैसा कि संयुक्त बयान में पहले उल्लेख किया गया था।
चीन की प्रतिक्रिया
चीन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को औपचारिक रूप से चुप्पी से लिया, क्योंकि वहां लूनर न्यू ईयर का मौसम था। हालांकि चीनी राजदूतावास ने कहा कि “ट्रेड युद्ध किसी के हित में नहीं होते” और इस फैसले को आम तौर पर सकारात्मक माना जा रहा है। ट्रंप के टैरिफ का चीन पर कुल प्रभाव लगभग 36% तक था, जो अब घटकर करीब 21% रह जाएगा, जिससे वहाँ की आर्थिक ग्रोथ को कुछ राहत मिल सकती है। चीन पहले से ही अपने व्यापार में विविधीकरण कर रहा है, जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और यूरोपीय यूनियन के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि आगामी ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक से पहले यह माहौल दोनों देशों के बीच संबंधों में थोड़ा सुधार लाने में मदद कर सकता है।
यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया
यूरोपीय नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने इसे लोकतंत्र में “जाँच और संतुलन” की जीत करार दिया। वित्त मंत्री निकोलस फ़ोरिसियर ने कहा कि यदि आवश्यक हुआ तो यूरोपीय संघ के पास अमेरिका को जवाब देने के उपकरण (‘ट्रेड बज़ुका’) मौजूद हैं। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि अब उनका व्यापारिक बोझ कम होगा और जर्मन कंपनियाँ अरबों डॉलर के रिफंड की उम्मीद रख सकती हैं। जर्मन वित्तमंत्रियों ने भी संकेत दिया कि यूरोप अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ा रहा है और नए मुक्त व्यापार समझौतों पर काम कर रहा है।
आर्थिक प्रभाव
टैरिफ बढ़ने से घरेलू महंगाई बढ़ने की संभावनाएँ हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि आयात-शुल्क मूलतः एक तरह का कर है, जिसका बोझ अक्सर उपभोक्ताओं को उठाना पड़ता है। फेडरल रिजर्व के सर्वे में भी यह दिखा है कि 2025 में लागू अन्य टैरिफ का लगभग 90% भार अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं ने झेला। लोकमत में यह भी सामने आया है कि 57% अमेरिकी महंगाई के लिए टैरिफ को दोषी मानते हैं और डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि ट्रंप की नीतियाँ जीडीपी की बजाय आम आदमी पर असर कर रही हैं। हालांकि प्रशासन का दावा है कि सेक्शन 301 और 232 लागू करने से वित्तीय आय में कोई गिरावट नहीं आएगी। बाजारों ने तुरन्त राहत की साँस ली है: सुप्रीम कोर्ट की खबर आते ही अमेरिकी शेयर बाजार चमक उठे, जबकि दक्षिण कोरियाई बाजार में भी तेज़ी आई। ऑक्सफ़ोर्ड अर्थशास्त्र के आंकलन के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कुल टैरिफ दर करीब 12.8% से घटकर 8.3% रह जाएगी, जिससे प्रारंभिक रूप से आर्थिक सक्रियता बढ़ सकती है। लेकिन उन्होंने चेताया है कि दीर्घकाल में प्रशासन नए कानूनों के ज़रिए टैरिफ स्तर को पुराने के करीब बनाए रख सकता है, जिससे अनिश्चितता बनी रहेगी।
विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि अधिकांश देश स्थिर व्यापारिक समझौतों को ही प्राथमिकता देंगे, क्योंकि निरंतर व्यापार समझौतों के भरोसे से ही वैश्विक अर्थव्यवस्था सुचारू चल सकती है।

